शिक्षाप्रद कहानियों का अनमोल संग्रह

जिंदगी बदलने वाली 5 शिक्षाप्रद लघु कहानिया 5 Best Moral Stories in Hindi

जिंदगी बदलने वाली 5 शिक्षाप्रद लघु कहानिया 5 Best Moral Stories in Hindi

Stories in Hindi: दादी और नानी की मीठी कहानियों का संसार इतना सुंदर और लुभावना है कि बाल-मन उससे बाहर निकलना ही नहीं चाहता। हर बालक यही चाहता है कि कहानी बच्चों की रात की कहानियां बस चलती ही जाए। हर रात, सोने से पहले, नानी या दादी की गोदी में सिर रखकर बच्चों की बाल कहानियां सुनने की बातें कई बच्चों को परी-कथा जैसी लग सकती हैं। कहानियाँ, जो कि हमारे मन को सुंदर विचार दें, मस्तिष्क को कल्पना की ऊँची उड़ान दें और भावनाओं के जुड़ाव का माध्यम बन जाएँ. ऐसी ही कुछ छोटे बच्चों की मजेदार कहानियां इस संकलन का हिस्सा हैं। अगर आप प्रेरक और शिक्षाप्रद कहानियाँ पढ़ना चाहते है ये देखे –

शिक्षाप्रद कहानियों का अनमोल संग्रह

शिक्षाप्रद कहानियों का अनमोल संग्रह

दादी और नानी के मुंह से हमने कई बार कहानियां सुनी हुई है, वहीं कुछ कहानियां ऐसी भी होती है जो कि, आपको किताबों में भी मिल जाएंगे, जिन्हें पढ़कर आप कई तरह की शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं। साथ ही अपने बच्चों को पढ़ा या सुना करके उन्हें भी शिक्षा दे सकते हैं। हर बार यही चाहता है कि, कहानी के माध्यम से कुछ सीख सके हर रात सोने से पहले उसे कोई ऐसी कहानियां सुनाएं, जिसमें उसे एक अच्छी शिक्षा भी मिलती हो।

कहानियां बच्चों के मन को और पवित्र कर देती है, कहानियां जो कि हमारे मन को सुंदर विचार देती है। वह मस्तिष्क को कल्पना के ऊंची उड़ान देती हो और भावनाओं की जुड़ाव का माध्यम बनती हो ऐसी कुछ छोटी और बच्चों की मजेदार कहानियां। आज हम आपके सामने लेकर आए हैं, अगर आप इंतजार शिक्षाप्रद कहानियां को पढ़ना चाहते हैं तो, आप नीचे दिए गए कॉलम्स महीने पढ़ सकते हैं, यहां पर आप को सबसे सुंदर 5 प्रेरक कहानियां बता रहे है, जिसे आप पढ़ सकते है।

5 शिक्षाप्रद लघु कहानिया

पैसों का पेड़

प्रिय मित्रों, पहले की तरह यहां फिर हम छोटे बच्चों की मजेदार कहानियां प्रस्तुत कर रहे हैं। आशा है आपको ये कहानियां पसंद आएगी।

एक ग़रीब लकड़हारा लकड़ियाँ काटकर अपने घर जा रहा था। रास्ते में उसे एक साधु बाबा मिले। सर्दियों के दिन थे। साधु बाबा ठंड से ठिठुर रहे थे। लकड़हारे ने कुछ लकड़ियाँ साधु बाबा के पास जला दीं। उन्हें बहुत आराम मिला। खुश होकर उन्होंने लकड़हारे को एक अँगूठी दी। उन्होंने लकड़हारे को बताया कि यदि वह इस अँगूठी को पहनकर मंत्र पढ़ेगा तो उसके सामने पैसों का एक पेड़ उग आएगा। फिर वह जितने चाहे उतने पैसे तोड़ सकता है। उन्होंने लकड़हारे को एक मंत्र भी बताया। पेड़ उगाने के लिए यह मंत्र पढ़ना जरूरी था।

लकड़हारे ने साधु बाबा को धन्यवाद दिया और अपने घर आ गया। उसने अपनी पत्नी को अँगूठी दिखाई। वह भी बहुत खुश हुई। अब उन्हें जब भी पैसों की ज़रूरत होती थी, वे दोनों पैसों का पेड़ उगा लेते थे।

एक दिन उनके एक पड़ोसी ने उन्हें ऐसा करते हुए देख लिया। उसे लालच आ गया। एक रात उसने वह अँगूठी चुरा ली। उसने अँगूठी को पहन लिया और पैसों का पेड़ उगने का इंतजार करने लगा। लेकिन कुछ नहीं हुआ। उसे पता ही नहीं था कि पेड़ उगाने के लिए मंत्र भी पढ़ना पड़ता है।

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उधर लकड़हारा परेशान था। उसने पूरे घर में अँगूठी दूँढी, लेकिन उसे कहीं भी अँगूठी नहीं मिली। वह परेशान होकर साधु बाबा के पास पहुँचा। साधु बाबा ने अपनी शक्ति से चोर का पता लगा लिया।

अँगूठी उस लालची पड़ोसी के ही पास थी। साधु बाबा ने उससे अँगूठी ले ली। उसे पुलिस ने पकड़ लिया और कड़ी सज़ा दी।

इसीलिए कहते हैं कि चोरी करना बुरी बात है।

बुद्धूमल का सपना टूटा

तुमने सुना होगा कि दिन में सपने देखना अच्छी बात नहीं है। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो दिन में आँखें खोलकर सपने देखते हैं। क्या कहा! आँखें खोलकर कोई सपने कैसे देख सकता है? अरे भाई, देख सकता है- कुछ ऐसे।

एक थे बुद्धूमलजी। अपने नाम की तरह वे सच में बुद्धू ही थे। साथ में कमचोर भी थे। कामचोर यानी जो काम से मन चुराए।

तो एक दिन बुद्धूमलजी की माँ ने उनसे कहा, ‘बेटा, तू अब बड़ा हो गया है, कुछ कामकाज सीख। जा, घर से बाहर निकलकर देख, सब लोग कितना काम करते हैं।’

बुद्धूमलजी उस समय आलस में बिस्तर में पड़े हुए थे। उबासी लेते हुए वे उठे और घर ने निकलकर चल पड़े। वे थोड़ी ही दूर चले होंगे, तभी उन्होंने देखा कि एक बूढ़ी माई एक पेड़ के नीचे थककर बैठी हुई है। उसके सामने लकड़ियों का एक बड़ा-सा गट्ठर रखा हुआ था।

बुद्धूमल ने बूढ़ी माई से पूछा, ‘ए माई, कुछ काम मिलेगा क्या?’

बूढ़ी माई ने कहा, ‘अरे भाई, मैं तो खूद बहुत ग़रीब हूँ। मैं किसी को क्या काम दे सकती हूँ! लकड़ियाँ बेचकर जो पैसे मिलते हैं, उससे ही अपना काम चलाती हूँ। आज चलते-चलते बहुत थक गई हूँ।’

‘लाओ, मैं तुम्हारी मदद कर देता हूँ।’ बुद्धूमल ने कहा।

‘तुम बड़े ही भले हो, भैया। अगर तुम यह गट्ठर मेरे घर तक पहुँचा दो तो इसमें से कुछ लकड़ियाँ मैं तुम्हें भी दे दूँगी।’ बूढ़ी माई बोली।

बुद्धूमल खुश हो गए। उन्होंने गट्ठर सिर पर उठा लिया और चल पड़े। वे सोचते जा रहे थे – कोई बात नहीं, पैसे न सही लकड़ियाँ ही सही। अब इन लकड़ियों को बेचकर मुझे 20-25 रूपए तो मिल ही जाएँगे। उन रूपयों से मैं कुछ बीज खरीदूँगा। मेरे घर के बाहर जो थोड़ी-सी ज़मीन है, उस पर सब्ज़ियाँ उगाऊँगा। उन सब्ज़ियों को बेचकर जो पैसे मिलेंगे उन्हें थोड़ा-थोड़ा बचाकर थोड़ी और ज़मीन ख़रीद लूँगा। उस पर गेहूँ उगाऊँगा। फिर मुझे और बुहत सारे पैसे मिलेंगे। उन पैसों से एक ट्रैक्टर ख़रीद लूँगा। तब खेत जोतने में आसानी होगी। फ़सल को जल्दी से बाज़ार भी पहुँचा सकूँगा। ढेर सारे पैसे और मिल जाएँगे। उनसे एक बढ़िया घर ख़रीदूँगा। सब लोग कहेंगे कि बुद्धूमल कितना बुद्धीमान है।’

बुद्धूमल अपने सपने में इतना खो गए कि उन्हें पता ही नहीं चला कि आगे तालाब है, उनका पैर फिसला और वे छपाक से तालाब में गिर गए। साथ ही लकड़ियों का गट्ठर भी पानी में गिर गया।

बूढ़ी माई चिल्लाई, ‘अरे भैया, वह तुमने क्या किया, मेरी लकड़ियाँ गीली कर दीं, अब मैं क्या बेचूँगी! मेरी पूरे दिन की मेहनत बेकार हो गई। अब इन गीली लकड़ियों को कौन ख़रीदेगा?’

बुद्धूमल पानी से बाहर निकले और बोले, ‘माई, मुझे माफ़ कर दो। मैं अपने सपने में इतना खो गया था कि मुझे पता ही नहीं चला कि आगे तालाब है। मेरा तो लाखों का नुकसान हो गया माई!’

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बुद्धूमल सिर पकड़कर बैठ गए। तब बूढ़ी माई बोली, ‘बेटा, दिन में सपने देखना अच्छी बात नहीं है। मेहनत करो और फिर देखो, तुम्हें सब कुछ अपने-आप मिल जाएगा।’

गुल्लक: भरी या ख़ाली!

चुनमुन के पास मिट्टी की एक सुंदर गुल्लक थी, गुड्डे के आकार की। उस गुड्डे के सिर पर एक लंबा छेद था, जिससे चुनमुन उसके अंदर सिक्के डालती थी। उसकी मम्मी रोज़ उसे एक सिक्का देती थीं। चुनमुन गुल्लक को हिलाती थी तो खन-खन की आवाज़ के साथ सिक्के हिलते थे। इससे चुनमुन को पता चल जाता था कि गुल्लक अभी थोड़ी ख़ाली है।

फिर एक दिन ऐसा हुआ कि उसने गुल्लक को धीरे से हिलाया, लेकिन कोई आवाज़ ही नहीं आई। उसने फिर से, थोड़ा ज़ोर-से गुल्लक को हिलाया, फिर भी आवाज़ नहीं हुई। चुनमुन खुशी से चिल्ललाई, ‘मम्मी…मेरी गुल्लक भर गई। देखो न! आवाज़ ही नहीं आ रही है।’

चुनमुन के आस-पास बहुत से खिलौने पड़े हुए थे। उन्होंने यह बात सुनी। वे आपस में काना-फूसी करने लगे …. कार बोली, ‘सुना तुमने, गुल्लक पूरी भर गई है।‘ ‘हां, मैंने भी सुना। कितने सारे पैसे होंगे अंदर!’ जोकर बोला।

‘काश, मैं इस पैसे वाले गुड्डे से शादी कर पाऊँ, फिर मेरे पास भी ढेर सारे पैसे हो जाएँगे।’ गुड़िया ने कहा।

धीरे-धीरे सभी खिलौने इस गुड्डे का बहुत आदर करने लगे। उन्हें उसकी बातें बहुत अच्ची लगती थीं।

खिलौने उसकी तारीफ़ करते और कहते-

‘देखो, कैसी राजकुमार जैसी छवि है।’

‘अब तो हिलाने से भी आवाज़ नहीं करता।’

‘अरे, बड़े लोग ऐसे ही होते हैं।’

‘हाँ भई, जब आपके पास पैसा हो तो अपने आप ऐसी सभ्यता आ जाती है।’

इस तरह सब खिलौने उसके आस-पास मँडराते रहते थे।

कुछ दिनों के बाद चुनमुन का जन्मदिन आया। वह बहुत खुश थी, क्योंकि वह समय आ गया था, जब उसे अपनी गुल्लक के पैसे निकालने थे। उसे यह गुल्लक बहुत पसंद थी, इसीलिए मम्मी ने उसके लिए इसी तरह की और गुल्लक लाकर रखी थी – एक और सुंदर गुड्डा।

चुनमुन अपने कमरे में आई और पुरानी गुल्लक को उठाकर नई गुल्लक उसकी जगह रख दी। उसने नई गुल्लक को हिलाकर देखा। उसमें से भी कोई आवाज़ नहीं आई- क्योंकि वह ख़ाली थी। उसमें कोई सिक्का था ही नहीं।

उसके खिलौनों ने देखा कि ख़ाली गुड्डा भी उतना ही सुंदर था, जितना भरा हुआ था। इससे भी कोई आवाज़ नहीं आ रही थी, यह भी शांत खड़ा हुआ था।

और तब उन्हें समझ में आया कि शांत और सभ्य होने के लिए पैसे वाला होना ज़रूरी नहीं है। इसीलिए वे नए गुड्डे का भी उतना ही आदर करते थे, जितना पुराने, भरे हुए गुड्डे का करते थे।

युद्ध (छोटे बच्चों की कहानियां)

एक बार एक भालू और एक कठफोड़वे के बीच लड़ाई हो गई। बात इतनी बिगड़ गई कि उन्होंने युद्ध का ऐलान कर दिया। सारे जानवर भालू की तरफ़ थे और सारे पक्षी और कीड़े-मकोड़े कठफोड़वे की तरफ़।

कठफोड़वे ने अपने एक गुप्तचर मच्छर को जानवरों के पास भेजा, चुपके से यह पता लगाने के लिए कि वहाँ क्या चल रहा है। मच्छर छिपकर जानवरों की बातें सुनने लगा।

जानवरों के दल की सरदार लोमड़ी थी। वह अपने साथियों को समझा रही थी-

‘मेरी लाल पूँछ तुम सबको दूर से ही नज़र आ जाती है। इसीलिए मैं तुम्हें संकेत देने के लिए अपनी पूँछ का इस्तेमाल करूँगी। जब मैं अपनी पूँछ को हवा में सीधा खड़ा करूँ तो समझना कि रास्ता साफ़ है और आगे बढ़ते रहना। और अगर मैं पूँछ को हिलाऊँ तो समझ लेना कि ख़तरा है और हम पूरी तरह घिर चुके हैं। ऐसी स्थिति में तुम हथियार डाल देना और हार मान लेना।’ सब जानवरों ने एक साथ कहा, ‘ठीक है।’

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मच्छर ये ख़बर लेकर वापिस अपने साथियों के पास पहुँचा। उसने सबको लोमड़ी की योजना बताई। फिर सब कीड़ों और पक्षियों ने एक और योजना बनाई।

अगले दिन सुबह युद्ध शुरू हुआ। जानवर चीख़ते-चिंघाड़ते हुए आगे बढ़ रहे थे और कीड़े अपने पेखों से ज़ ऽ ऽ ऽ की तेज़ आवाज़ निकाल रहे थे। पक्षियों के शोर से पूरा आकाश गूँज रहा था।

लोमड़ी सबसे आगे आई। सब जानवर उनकी पूँछ देख रहे थे। पूँछ खड़ी हुई थी और जानवर आगे बढ़ते जा रहे थे।

जब लोमड़ी थोड़ी आगे निकल गई तो कठफोड़वे ने एक ततैया को उसके पास भेजा। ततैया ने लोमड़ी की पूँछ पर डंक मारना शुरू कर दिया। लोमड़ी को बहुत दर्द हो रहा था। लेकिन वह अपनी पूँछ को सीधा रखने की पूरी कोशिश कर रही थी। अपने साथियों को संकेत देने के लिए उसे ऐसा करना पड़ा।

आखि़रकार ये दर्द उससे सहन नहीं हुआ और उसने पूँछ हिलाई, ततैया को भगाने के लिए। जानवरों ने दूर से देखा कि लोमड़ी पूँछ हिला रही है। उन्होंने सोचा कि ख़तरा है और हार मानकर वापिस लौट गए। लोमड़ी बेचारी दुश्मनों के बीच अकेली पड़ गई। चारों तरफ़ से दुश्मनों को आता देख वह भी घबराकर भागी।

इस तरह अपनी बुद्धीमानी से छोटे-छोटे पक्षियों और कीड़ों ने बड़-बड़े जानवरों को हरा दिया।

सड़क कहाँ जाती है?

भीखू हलवाई का बेटा बच्चू एकदम मनमौजी था। मन है तो काम कर लिया नहीं है तो पड़ा रहने दो……..हो जाएगा जब होना होगा।

एक दिन उसने दुकान से एक दौना भरकर जलेबियाँ लीं। वह गाँव के बाहर जानेवाली सड़क के किनारे बैठ गया और जलेबियाँ खाने लगा।

तभी वहाँ एक थका-माँदा यात्री आया। वह बच्चू से बोला, ‘भैया बड़ी दूर से चलकर आ रहा हूँ। बड़ी भूख लगी है, क्या यहाँ कुछ अच्छा खाने को मिलेगा?’

बच्चू ने उसे एक जलेबी दी और कहा, ‘ये लो भैया, जलेबी खाओ और यदि तुम्हें ज़्यादा चाहिए तो भीखू हलवाई की दुकान पर चले जाओ। सब कुछ खाने को मिलेगा।’

यात्री ने देखा कि वहाँ पर दो सड़कें थीं। उसने बच्चे से पूछा, ‘अच्छा भैया, यह बताओ कि भीखू हलवाई के यहाँ इनमें से कौन-सी सड़क जाती है?’

यह बात सुनकर जैसे बच्चू को बड़ी तसल्ली मिली। वह हँसकर बोला, ‘ए भाई, तुम तो मुझसे भी ज़्यादा आलसी निकले। मेरे बाबा हमेशा कहते थे कि मुझसे ज़्यादा आलसी इंसान हो ही नहीं सकता। लेकिन अब मैं उन्हें बताऊँगा कि उनकी बात ग़लत थी।’

यात्री को समझ में नहीं आ रहा था कि मामला क्या है। उसने तो बस रास्ता ही पूछा था न। इसमें आलसी होने की क्या बात है। ख़ैर, उसने फिर से पूछा, ‘यह सब छोड़ों और बताओ कि भीखू हलवाई की दुकान तक कौन-सी सड़क जाती है?’

बच्चू बोला, ‘ऐसा है भैया, ये दोनों ही सड़कें कहीं भी नहीं जातीं। बस यहीं पड़ी रहती हैं। हाँ, अगर कुछ खाना है तो थोड़े हाथ-पैर हिलाओ और खुद चलकर इस दाएँ हाथ वाली सड़क पर चले जाओ। सीधे दुकान पर पहुँच जाओगे। और कहीं सड़क के भरोसे रूक गए तो भैया यहीं खड़े रह जाओगे, क्योंकि ये सड़के तो महा आलसी हैं। बरसों से यही पड़ी हुई हैं।’

यह सुनना था कि यात्री का हँसी के मारे बुरा हाल हो गया। हँसते-हँसते वह दाएँ हाथ वाली सड़क पर चल दिया।

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