पंचतंत्र की शिक्षाप्रद कहानिया

पंचतंत्र की शिक्षाप्रद कहानिया | Panchtantra ki kahaniyan Download PDF File

पंचतंत्र की शिक्षाप्रद कहानिया | Panchtantra ki kahaniyan Download PDF File

Panchtantra ki kahaniyan : हम सब जानते हैं कि, हमारे देश का अपना एक अलग ही साहित्य है और साहित्य में लोक कथाओं का भी विशेष महत्व होता है। हमारे यहां पर अलग-अलग साहित्य में अलग-अलग तरह की कहानियां और कथाएं लिखी गई है हमारे देश का साहित्य काफी पुराना है और साथ ही इसमें कई तरह की लोक कथाएं भी शामिल है, इन्ही कथाओं में से एक ऐसी विष्णु शर्मा द्वारा रचित संस्कृत का कालजई अमर ग्रंथ पंचतंत्र की कहानियों को पांच भागों में बांटा गया है।

पंचतंत्र की शिक्षाप्रद कहानिया

यह कहानी विशेषकर बच्चों के लिए काफी शिक्षाप्रद होती है। अगर आप पंचतंत्र की संपूर्ण कहानियों को पढ़ना चाहते हैं तो, आप इसकी पीडीएफ फाइल को भी डाउनलोड कर सकते हैं। यहां डाउनलोड के लिए भी हमने एक नीचे लिंक दिया गया। उसी के साथ ही आपको यहां पर पंचतंत्र से जुड़ी हुई कई और भी कहानी आपको बताने जा रहे हैं जिसे आप पढ़कर अपने दोस्तों रिश्तेदारों और अपने बच्चों को शिक्षा दे सकते हैं। यहां पर आपको कई तरह के अलग-अलग कहानियां मिल जाएंगी।

पंचतंत्र की शिक्षाप्रद कहानिया

बहुत पुरानी बात है  महिल्यारोप  नामक नगर में अमर शक्ति नामक राजा राज्य करते थे । राजा बहुत ही योग्य वीर और प्रतापी था । अमर शक्ति के तीन पुत्र थे किंतु तीनों मैं राजा बनने के गुण नहीं थे। राजा ने उन्हें अच्छी शिक्षा देने के बहुत प्रयत्न किए परंतु वह असफल रहा। तभी राजा को उनके एक मंत्री ने आचार्य विष्णु शर्मा के बारे में बतलाया। राजा आचार्य विष्णु शर्मा के पास गए और राजकुमारों को शिक्षा देने का निवेदन किया। आचार्य विष्णु शर्मा ने राजा की बात मान ली और तीनों राजकुमारों को अपने आश्रम लाकर उन्हें शिक्षित करने के लिए कई प्रकार की कहानियों की रचना की। इन कहानियों को मनुष्य और जंगल के जानवरों के पात्रों के माध्यम से मनोरंजक बनाया गया। आचार्य विष्णु शर्मा द्वारा रची गई कहानियों और उनके द्वारा प्रदान की गई शिक्षा के कारण तीनों राजकुमार जल्द ही कुशल राजनैतिज्ञ बन गए।

पंचतंत्र की कहानियों की रचना आचार्य विष्णु शर्मा द्वारा लगभग 2000 साल वर्ष पूर्व की गई थी । पंपंचतंत्र की कहानी की रचना पांच भागों में की गई थी किंतु अब इसके मूल भाग उपलब्ध नहीं है। चतंत्र की कहानियों को पांच खंडों में बंटे होने के कारण होने के कारण पंचतंत्र कहा जाता है।

आईये हम कुछ प्रमुख पंचतन्त्र की कहानियों के बारे में जानते हैं –

बन्दर की चतुराई ( पंचतंत्र कहानी) –

बन्दर और मगरमच्छ की कहानी पंचतन्त्र की सबसे प्रमुख और शिक्षाप्रद कहानियों में से एक है जो सदियों से कही और सुनी जा रही है | बहुत पुरानी बात है एक तालाब के किनारे जामुन का पेड़ था उस पेड़ पर एक बंदर रहता था | बंदर की दोस्ती एक मगरमच्छ से थी मगरमच्छ उसी तालाब में रहता था | बंदर जब भी जामुन के फल खाता था तो उसमें से कुछ पल अपने दोस्त मगरमच्छ को भी खिलाता था | इस तरह दोनों की दोस्ती बड़े मजे से कट रही थी | एक दिन मगरमच्छ ने सोचा – “ मैं अकेला ही जामुन के फल खाता हूं क्यों ना आज अपनी बीबी के लिए फल ले जाऊं ? “
ऐसा सोचकर मगरमच्छ अपनी बीबी के लिए जामुन के फल ले गया | मगरमच्छ की बीवी को फल बहुत पसंद आए | उसने पूछा –“ तुम यह फल कहां से लाते हो ?”
मगरमच्छ बोला- “ मेरा एक दोस्त है बंदर | वह एक जामुन के पेड़ पर रहता है और वही मुझे यह फल देता है | हम दोनों प्रतिदिन बड़े मजे से यह फल खाते हैं |
मगरमच्छ की बीबी बोली – “ बन्दर रोज इतने मीठे फल खाता है तो उस बंदर का कलेजा कितना मीठा होगा ? मुझे तो उस बंदर का कलेजा चाहिए |
गरमच्छ के मना करने पर उसकी बीबी नाराज हो गई और उसने मगरमच्छ से बात करना बंद कर दिया | मजबूरी में मगरमच्छ बंदर का कलेजा लाने के लिए तैयार हो गया | मगरमच्छ अपने दोस्त बंदर के पास पहुंचा और बोला- “मित्र ! तुम्हारी भाभी को जामुन के फल बहुत अच्छे लगे और आज उसने तुम्हे घर पर खाने के लिए बुलाया है |
बंदर मगरमच्छ की बातों में आ गया और मगरमच्छ के साथ जाने के लिए तैयार हो गया | बंदर बोला- ” मैं तैर ही नहीं सकता तो मैं तुम्हारे घर कैसे जाऊंगा |”
मगरमच्छ ने बन्दर को अपनी पीठ पर बैठा लिया और उसे घर ले जाने लगा | जब दोनों बीच तालाब में पहुंचे तो बातों ही बातों में मगरमच्छ ने बंदर को बता दिया कि उसकी बीबी को बंदर का कलेजा चाहिए | मगरमच्छ की बात सुनकर बंदर पहले तो बहुत डर गया फिर वह अपने आप को संभालते हुए बोला – “ मित्र ! मैं तो अपना कलेजा जामुन के पेड़ पर ही भूल आया हूं | हम एक काम करते हैं वापस जामुन के पेड़ पर चलते हैं और वहां से मेरा कलेजा लेकर आ जाते हैं |”
मगरमच्छ बंदर की बातों में आ गया और दोनों वापस जामुन के पेड़ की ओर जाने लगे | जैसे ही दोनों जामुन के पेड़ के पास पहुंचे बंदर झट से मगरमच्छ की पीठ से कूदकर पेड़ पर चढ़ गया और बोला –“ अरे बेवकूफ ! क्या कोई भी अपना कलेजा पेड़ पर रखता है | कलेजा तो उसके शरीर में ही रहता है | तुमने मुझे धोखा दिया है आज से तुम्हारी और मेरी दोस्ती खत्म |”
इसके बाद बंदर ने कभी भी मगरमच्छ को जामुन के फल नहीं खिलाए और दोनों की दोस्ती टूट गई |
शिक्षा – बन्दर की चतुराई इस पंचतन्त्र कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि मुसीबत के समय घबराना नहीं चाहिए | बुद्धि का उपयोग करके बड़ी से बड़ी बाधा को टाला जा सकता है|

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2 दुष्ट बगुला और केकड़ा की पंचतंत्र कहानी –

बहुत पुरानी बात है एक सरोवर में एक वृद्ध बगुला रहता था | सरोवर के सभी जीव उसे बगुला दादा के नाम से जानते थे | बूढ़ा होने के कारण वह शिकार करने में असमर्थ हो गया था इसीलिए एक दिन भूख के कारण तालाब के किनारे बैठ कर रो रहा था | तभी एक केकड़े ने उसे रोता हुआ देखा और उसके पास आकर उसके रोने का कारण पूछा | बगले ने बहाना बनाते हुए केकड़े को बतलाया कि इस क्षेत्र में जल्दी बहुत बड़ा अकाल कर पड़ने वाला है जिसके कारण यहां कई वर्षों तक पानी नहीं गिरेगा और कई जीवो की मृत्यु हो जाएगी |
केकड़ा बगुले की बात में आ गया और उसने सरोवर के सभी जीवों को यह बात बतला दी | सभी जानवर डर के कारण बगुले के पास आकर इसका हल पूछने लगे | बगुला तो इसी मौके की तलाश में था | बगुले ने बतलाया की पास ही एक विशाल सरोवर है, अगर हम सभी वहां चले जाएं तो अकाल से बच सकते हैं क्योंकि उस सरोवर में इतना पानी रहता है कि कई सालों तक अगर पानी ना भी गिरे तो सूखेगा नहीं |
बगुले ने सभी जीवो को इस बात पर भी राजी कर लिया कि वह सभी को अपनी पीठ पर बैठाकर उस बड़े तालाब तक पहुंचा देगा | अब बगुला प्रतिदिन तालाब की मछलियों और छोटे-छोटे जीवो को अपनी पीठ पर बैठा कर ले जाता और एक पहाड़ी पर ले जाकर उन्हें गिरा देता और उनको खा जाता था | बहुत दिनों तक इसी प्रकार चलता रहा |
एक दिन केकड़ी ने बगुले से दूसरे सरोवर तक जाने का अनुरोध किया | बगुला भी उसे ले जाने के लिए तैयार हो गया | जब दोनों जा रहे थे तभी केकड़े को एक पहाड़ी पर हड्डियों के ढेर दिखे | केकड़े ने बगुले से उन हड्डियों के ढेर के बारे में जानना चाहा | बगुला जनता था अब केकड़ा कहीं नहीं जा सकता तो उसने केकड़े को सारी सच्चाई बतला दी और कहा कि वह अब उसे भी खाएगा | इतना सुनते ही केकड़े ने बगुले की गर्दन को अपने पैने और नुकीले दांतों से जकड़ लिया और तब तक जकड़े रहा जब तक कि बगले के प्राण नहीं निकल गए |
इसके बाद केकड़ा उस स्थान से धीरे-धीरे अपने सरोवर तक आ गया केकड़े को देखते ही तालाब के सभी सभी जीवो ने उसके वापस लौटने का कारण पूछा | तब केकड़े ने सभी जीवो को बगुले की सच्चाई के बारे में बतलाया |
शिक्षा- दुष्ट बगुला और केकड़ा की पंचतंत्र कहानी से शिक्षा मिलती है कि किसी की भी चिकनी-चुपड़ी बातों पर आकर उस पर विश्वास नहीं करना चाहिए।

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3 उल्लू और हंस की पंचतंत्र कहानी –

एक जंगल में ऊंचे पहाड़ की चोटी पर एक दुर्ग था उस दुर्ग के पास ही एक विशाल पेड़ था पेड़ पर एक उल्लू रहता था। पहाड़ी के नीचे एक तालाब था जिसमें हंसों का एक झुंड रहता था | उल्लू अक्सर भोजन की तलाश में तालाब के पास जाया करता था | हंसों को देखकर उल्लू बहुत अधिक प्रभावित हुआ । वह किसी भी तरह हंसों से दोस्ती करना चाहता था। उल्लू प्रतिदिन तालाब के पास जाकर बैठ जाता था और किसी ना किसी बहाने हंसो से बात करने का प्रयास किया करता था। धीरे-धीरे उसकी दोस्ती हंसों के राजा हंसराज से हो गई। हंसराज अब प्रतिदिन उल्लू के साथ बातें किया करता और उसे अपने घर ले जाकर अच्छा-अच्छा स्वादिष्ट भोजन करवाता था। उल्लू हंस से दोस्ती करके खुश तो बहुत था मगर उसे मन ही मन चिंता लगी रहती थी कि अगर उसकी सच्चाई हंसराज को पता चल गई तो वह दोस्ती तोड़ देगा। इसलिए उल्लू अपने आप को उल्लूओं का राजा उलूकराज बतलाने लगा। उल्लू को किले में होने वाली हर गतिविधि की जानकारी थी वह किले में सैनिकों की गतिविधियों से भली भांति परिचित था। एक दिन उल्लू ने हंसराज से कहा-“ मित्र तुम पहाड़ी पर जो दुर्ग देख रहे हो वह मेरा है | मैं तुम्हारे यहां प्रतिदिन भोजन ग्रहण करता हूं | अब तुम्हे भी कुछ दिनों के लिए मेरा आतिथ्य स्वीकार करना पड़ेगा।“

हंसराज ने ना जाने के कुछ बहाने बनाए लेकिन उल्लू नहीं माना और हंसराज को अपने साथ पहाड़ी पर ले गया। जिस समय वह पहाड़ी पर पहुंचे उस समय सैनिकों की परेड चल रही थी। परेड के बाद सैनिकों ने सलामी दी। उल्लू हंसराज से बोला- “ मित्र! देखो यह सलामी तुम्हारे लिए है।”

हंसराज यह देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। उल्लू बोला कि जब तक हंसराज यहां रहेंगे प्रतिदिन इसी तरह सलामी होगी। दूसरे किसी कारण बस सैनिकों को दुर्ग छोड़ कर जाना था | प्रातः सभी सैनिक दुर्ग छोड़कर जाने लगे | तभी हंसराज ने उल्लू को सैनिकों के जाने की बात बतलाई। सैनिकों के इस प्रकार अचानक जाने से उल्लू चिंता में पड़ गया और घू-घू की आवाज निकालने लगा। उल्लू की आवाज को सैनिकों ने अशुभ समझा और उस दिन जाना स्थगित कर दिया। उल्लू ने हंस को बतलाया कि उसने सैनिकों को रुकने का आदेश दिया है तभी सारे सैनिक रुक गए हैं | दूसरे दिन प्रातः सैनिक जैसे ही जाने के लिए तैयार हुए उल्लू फिर से घू-घू की आवाज निकालने लगा । उल्लू की आवाज सुनकर उनका सेनापति क्रोधित हो गया और उसने सैनिकों को आदेश दिया कि इस उल्लू को मार दो। सैनिक में धनुष उठाकर उल्लू को निशाना होगे लगाते हुए तीर चला दिया | तीर उल्लू को ना लगकर बाजू में बैठे हुए हंसराज को लग गया | हंसराज ने तुरंत ही अपने प्राण त्याग दिए। हंसराज के मारे जाने से उल्लू बहुत दुखी हुआ । उसे लगा उसके झूठे दिखावे के कारण ही हंसराज की मृत्यु हुई है | उल्लू बेसुध होकर वहीँ रोने लगा | पास में ही एक गीदड़ यह सब देख रहा था और उसने उल्लू की वेसुधि का फायदा उठाते हुए उस पर झपट्टा मारकर काम तमाम कर दिया।

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शिक्षा – उल्लू और हंस की पंचतंत्र कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि कभी भी झूठा दिखावा नहीं करना चाहिए |

4 कबूतर और शिकारी की पंचतंत्र कहानी –

बहुत पुरानी बात है कबूतरों का एक झुण्ड था | चित्रगुप्त नामक एक कबूतर उस झुंड का राजा था। एक बार कबूतरों का जोड़ा भोजन की तलाश में कहीं जा रहा था तभी रास्ते में उन्हें एक स्थान पर बहुत सा अनाज बिखरा हुआ दिखलाई दिया। कबूतरों का झुंड उड़ते-उड़ते बहुत थक चुका था | उन्होंने सोचा कि नीचे उतर कर कहीं भोजन कर लिया जाए। कबूतरों को एक स्थान पर बिखरा हुआ बहुत सा अनाज दिखाई दिया | वह अनाज एक बहेलिया अर्थात शिकारी ने फैलाया था और ऊपर पेड़ पर एक जाल बांध दिया था ।
कबूतरों का झुंड जैसे ही भोजन के लिए नीचे उतरा वैसे ही शिकारी ने जाल गिरा दिया और सभी कबूतर उस जाल में फंस गए। यह देखकर चित्रगुप्त बहुत पछताया | झुंड के कबूतरों को लगा शायद आज वह जिंदा नहीं बच पाएंगे। लेकिन कबूतरों के राजा चित्रगुप्त ने अपना धैर्य नहीं खोया और उसने सभी कबूतरों से कहा कि वह जैसे ही वह “ फुर्र ” बोले सभी को एक साथ जाल सहित उड़ना है। यह कार्य कठिन अवश्य था लेकिन नामुमकिन भी नहीं था। चित्रगुप्त के “फुर्र ” बोलते ही सभी कबूतर एक साथ उड़ गए और उनके साथ जाल भी उड़ने लगा | यह देख कर शिकारी बहुत आश्चर्यचकित हुआ | उसे लगा कबूतर ज्यादा देर नहीं उड़ पाएंगे और वह कबूतरों के पीछे-पीछे दौड़ने लगा। लेकिन कबूतर अपनी इच्छाशक्ति से जाल को काफी दूर तक ले गए।
पास की एक पहाड़ी पर चित्रगुप्त का मित्र एक चूहा रहता था उसका नाम मूषकराज था। चित्रगुप्त जानता था कि अगर किसी भी तरह मूषकराज के पास पहुंच गए तो वह इस जाल को काट देगा। उसने अपनी योजना झुण्ड के सभी कबूतरों को बतलाई सभी ने अपने राजा की बात मानकर उस पहाड़ी की ओर उड़ान भरी। कबूतरों का झुंड उड़ते-उड़ते उस पहाड़ी पर पहुंच गया जहां मूषकराज रहता था। झुंड मूषकराज के बिल के सामने उतरा और चित्रगुप्त अपने मित्र को आवाज लगाई। मित्र की आवाज सुनकर मूषकराज बाहर आया और अपने मित्र चित्रगुप्त की यह हालत देखकर उसे बहुत दुख हुआ । कबूतरों के राजा चित्रगुप्त ने मूषकराज से जाल काटने के लिए कहा। मूषकराज ने एक तरफ से जाल काटना प्रारंभ किया और कुछ ही देर में पूरा जाल काट दिया। सभी कबूतर आजाद हो गए और उन्होंने मूषकराज को धन्यवाद दिया । इस प्रकार कबूतरों की एकता ने उनकी जान बचाई।
शिक्षा- पंचतन्त्र की इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि एकता में बहुत बल होता है।

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