शनि स्त्रोत का पाठ

शनि स्त्रोत का पाठ, | Dashrath Stuti Shani Dev Stotra PDF File Downoad

शनि स्त्रोत का पाठ, | Dashrath Stuti Shani Dev PDF File Downoad

Stuti Shani Dev : कोई भी इंसान शनि ग्रह की शांति,  शनि साढ़ेसाती, शनि ढैया शनि की महादशा से पीड़ित है तो, उसके लिए उसे शनि से जुड़े हुए कई तरह के उपाय करने की आवश्यकता होती है। यदि व शनि देव की दशा से बचना चाहता है तो, उसके लिए शनि स्त्रोत का नियमित पाठ उसे करना चाहिए।

शनि स्त्रोत का पाठ

शनि स्त्रोत का पाठ

शनिदेव का नियमित शनि स्त्रोत का पाठ करने से जीवन के समस्त परेशानियों से उसे मुक्ति मिल जाती है और वह मुक्ति जाकर जीवन को मंगलमय बनाने में आसानी होती है। ऐसा माना जाता है कि राजा दशरथ भी शनि के खौफ से नहीं बच पाए थे और शनी से सुरक्षा करने में उन्होंने शनि स्त्रोत की महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

शनि स्त्रोत का पाठ कब करे

इसलिए शनिवार की पूजा में इस पाठ का अत्यंत लाभकारी माना जाता है, शनिवार को शनि देव की पूजा का विधान है इस दिन यदि पूजा के साथ शनि स्त्रोत का पाठ किया जाए तो, वह काफी अधिक प्रभावशाली होता है। और इसी से शनि की दृष्टि से भी रक्षा हो सकती है कि मान्यता है कि, 10 श्लोक वाला स्त्रोत इस प्रकार दर्शाया गया है,, जिससे कि आपकी शनि की कृपा बनी रहे और आपके सभी बिगड़े हुए काम आसानी से सुधर जाए।

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पौराणिक कथाओं के अनुसार यह कहा जाता है कि, शनि भगवान के प्रकोप से बचने के लिए हर शनिवार शनि स्त्रोत का पाठ करना चाहिए। शनिवार के दिन शनि देव की भक्ति करने से वह अत्यंत प्रसन्न हो जाते हैं और अपने भक्तों को वरदान देते हैं।

साढ़ेसाती और ढैय्या जैसी समस्या से निजात पाने के लिए भी कई लोग शनिवार के दिन शनि स्त्रोत का पाठ करते हैं और श्रद्धा-भाव से शनि देव की भक्ति करते हैं। शनिवार के दिन शनि देव के मंदिर में जा कर तिल का तेल चढ़ाना चाहिए और इस दिन तिल का दान करना चाहिए।

शनि का वचन और स्‍त्रोत करने से लाभ

शनि स्‍त्रोत करने के कई लाभ है, जब बाद शनि देव ने वरदान स्‍वरूप राजा दशरथ को वचन दिया कि इस स्तोत्र को जो भी मनुष्य, देव अथवा असुर, सिद्ध तथा विद्वान आदि पढ़ेंगा, उसे शनि के कारण कोई बाधा नहीं होगी। जिनकी महादशा या अन्तर्दशा खराब चल रही है, या गोचर में अथवा लग्न स्थान, द्वितीय, चतुर्थ, अष्टम या द्वादश स्थान में शनि हो वे व्यक्ति यदि पवित्र होकर दिन में तीन बार प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल के समय इस स्तोत्र को ध्यान देकर पढ़ेंगे तो उन्हें निश्चित रुप से शनि पीड़ित नहीं करेगा।

शनि स्त्रोत का पाठ

दशरथकृत शनि स्तोत्र

 

नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठनिभाय च।

नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ।।

 

नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च।

नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते।।

 

नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ  वै नम:।

नमो दीर्घायशुष्काय कालदष्ट्र नमोऽस्तुते।।

 

नमस्ते कोटराक्षाय दुर्निरीक्ष्याय वै नम:।

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नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने।।

 

नमस्ते सर्वभक्षाय वलीमुखायनमोऽस्तुते।

सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करे भयदाय च।।

 

अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तुते।

नमो मन्दगते तुभ्यं निरिस्त्रणाय नमोऽस्तुते।।

 

तपसा दग्धदेहाय नित्यं  योगरताय च।

नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम:।।

 

ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज सूनवे।

तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात्।।

 

देवासुरमनुष्याश्च  सिद्घविद्याधरोरगा:।

त्वया विलोकिता: सर्वे नाशंयान्ति समूलत:।।

 

प्रसाद कुरु  मे  देव  वाराहोऽहमुपागत।

एवं स्तुतस्तद  सौरिग्र्रहराजो महाबल:।।

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