शेर और बिल्ली की कहानी

शेर और बिल्ली की मजेदार कहानीया | Sher Aur Billi Ki Kahani हिंदी में पढ़े

शेर और बिल्ली की मजेदार कहानीया | Sher Aur Billi Ki Kahani हिंदी में पढ़े

Sher Aur Billi Ki Kahani: बचपन से ही हम सभी ने शेर और बिल्ली की कहानियां सुनी हुई है और कई कहानियां पढ़ी हुई हुई है। आज हम आपके सामने कुछ ऐसी ही शेर और बिल्ली की कहानियां लेकर आए हैं जो कि, काफी मजेदार भी है। कई बार हम देखते हैं कि, जंगल में काफी होशियार बिलिया रहती है जो कि, हर किसी को बेवकूफ बनाना मैं माहिर होती है।

लेकिन इन कहानियों के माध्यम से हमें कुछ सीखने को ही मिलता है। जंगल के राजा शेर की कहानियां भी हमने कई तरह की पड़ी है, लेकिन आज हम आपको शेर और बिल्ली की कहानी आपके सामने ला रहे हैं जो कि, आप अपने बच्चों को सिखा सकते हैं और उन्हें पढ़कर सुना सकते हैं। इसके माध्यम से आपको कई तरह की चीजें सीखने को भी मिलेगी। इसके साथ ही आप इन कहानियों की पीडीएफ फाइल को भी डाउनलोड कर सकते है।

शेर और बिल्ली की कहानी

शेर और बिल्ली की कहानी

सालों पहले नील नामक जंगल में एक बड़ी होशियार बिल्ली रहती थी। हर कोई उससे ज्ञान प्राप्त करना चाहता था। जंगल के सारे जानवर उस बिल्ली को मौसी कहकर पुकारते थे। कुछ जानवर उस बिल्ली मौसी से पढ़ने के लिए भी जाते थे।

एक दिन बिल्ली मौसी के पास एक शेर आया। उसने कहा, “मुझे भी आपसे शिक्षा चाहिए। मैं आपका छात्र बनकर आपसे सबकुछ सीखना चाहता हूँ, ताकि जीवन में आगे मुझे कोई दिक्कत ना हो।”

कुछ देर सोचने के बाद बिल्ली बोली, “ठीक है, तुम कल से पढ़ने के लिए आ जाना।”

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अगले दिन से रोज़ाना शेर बिल्ली मौसी के यहाँ पढ़ने के लिए आने लगा। एक महीने में शेर इतना समझदार हो गया कि बिल्ली ने उससे कहा, “अब तुम मुझसे सब कुछ सीख चुके हो। तुम्हें कल से पढ़ाई के लिए आने की ज़रूरत नहीं है। तुम मेरे द्वारा प्राप्त की गई शिक्षा की मदद से अपने जीवन को आसानी से जी सकते हो।”

शेर ने पूछा, “आप सच कह रही हैं? मुझे अब सब कुछ आ गया है, क्या?”

बिल्ली ने जवाब दिया, “हाँ, मैं जो कुछ भी जानती थी, मैंने सब कुछ तुम्हें सीखा दिया है।”

शेर ने दहाड़ते हुए कहा, “चलो फिर क्यों ना आज इस विद्या को तुम पर ही आज़मा कर देख लिया जाए। इससे मुझे पता चल जाएगा कि मुझे कितना ज्ञान मिला है।”

डर के मारे सहमी हुई बिल्ली मौसी ने कहा, “बेवकूफ, मैं तुम्हारी गुरु हूँ। मैंने तुम्हें शिक्षा दी है, तुम इस तरह मेरे ऊपर प्रहार नहीं कर सकते हो।”

शेर ने बिल्ली की एक न सुनी और उसपर झपट पड़ा। अपनी जान बचाने के लिए तेज़ी से बिल्ली दौड़ने लगी। दौड़ते-दौड़ते वह पेड़ पर चढ़ गई।

बिल्ली को पेड़ पर चढ़ा हुआ देखकर शेर ने कहा, “तुमने मुझे पेड़ पर चढ़ना नहीं सिखाया। तुमने मुझे पूरा ज्ञान नहीं दिया।”

पेड़ पर चढ़ने के बाद राहत की साँस लेते हुए बिल्ली ने जवाब दिया, “मुझे तुम पर पहले दिन से ही विश्वास नहीं था। मैं जानती थी कि तुम मुझसे सीखने के लिए तो आए हो, लेकिन मेरे ही जीवन के लिए आफ़त बन सकते हो। यही कारण है कि मैंने तुम्हें पेड़ पर चढ़ना नहीं सिखाया। अगर मैंने तुम्हें यह ज्ञान भी दिया होता, तो तुम आज मुझे मार डालते।”

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गुस्से में बिल्ली आगे बोली, “तुम आज के बाद मेरे सामने कभी मत आना। मेरी नज़रों से दूर हो जाओ। ऐसा शिष्य जो अपने गुरु का सम्मान नहीं कर सकता, वो किसी क़ाबिल नहीं।”

बिल्ली मौसी की बात सुनकर शेर को भी गुस्सा आया, लेकिन वो कुछ नहीं कर सकता था, क्योंकि बिल्ली पेड़ पर थी। गुस्से को मन में लेकर शेर वहाँ से दहाड़ते हुए चला गया।

कहानी से सीख
शेर बिल्ली की कहानी से यह सीख मिलती है कि किसी पर भी आँखें मूँदकर भरोसा नहीं करना चाहिए। जीवन में हर किसी से सतर्क रहने पर ही आप खुद को सुरक्षित रख सकते हैं।

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बिल्ली के गले में घंटी
एक शहर में एक बहुत बड़ा मकान था. उस मकान में चूहों ने डेरा जमा रखा था. जब भी मौका मिलता वे अपने-अपने बिलों से निकलते और कभी खाने की चीज़ों पर अपना हाथ साफ़ करते, तो कभी घर की अन्य चीज़ें कुतर देते. उनका जीवन बड़े मज़े से बीत रहा था.

इधर मकान मालिक चूहों से तंग आ चुका था. इसलिए वह एक बड़ी सी बिल्ली ले आया. अब वह बिल्ली उसी घर में रहने लगी. बिल्ली के आने से चूहों का जीना हराम हो गया. जो भी चूहा बिल से निकलता, वह उसे चट कर जाती.

चूहों का बिलों से निकलना मुहाल हो गया. वे दहशत के माहौल में जीने लगे. बिल्ली उनके लिए एक बहुत बड़ी समस्या बन गई थी. समस्या से निज़ात पाने का उपाय निकालने के लिए एक दिन चूहों की सभा बुलाई गई.

सभा में सभी चूहे उपस्थित हुए. सभा की अध्यक्षता कर रहे चूहे ने सबको संबोधित करते हुए कहा, “साथियों, आप सब जानते ही हैं कि हम लोग बिल्ली रुपी बहुत बड़ी समस्या से जूझ रहे हैं. वह रोज़ हमारे किसी न किसी साथी को मारकर खा जाती है. बिलों से निकलना मुश्किल हो गया है. लेकिन इस तरह हम कब तक बिल में छुपकर रहेंगे. भोजन की व्यवस्था के लिए तो हमें बिल से बाहर निकलना ही होगा. यह सभा इसलिए आयोजित की गई है, ताकि इस समस्या का समाधान निकाला जा सके. आपके सुझाव आमंत्रित हैं. आप एक-एक कर अपने सुझाव दे सकते हैं.”

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एक-एक कर सभी चूहों से इस समस्या पर अपनी-अपनी सोच के हिसाब से सुझाए दिए. लेकिन किसी भी उपाय पर सब एकमत नहीं हुए.

तब अंत में एक चूहा उठा और चहकते हुए बोला, “मेरी दिमाग में अभी-अभी एक बहुत ही बढ़िया उपाय आया है. क्यों न हम बिल्ली के गले में एक घंटी बांध दें? इस तरह बिल्ली जब भी आस-पास होगी, उस घंटी की आवाज़ से हमें पता चल जायेगा और हम वहाँ से भाग जायेंगे. कहो कैसा लगा उपाय?”

सारे चूहों को ये उपाय बहुत पसंद आया. वे ख़ुशी में नाचने और झूमने लगे, मानो उनकी समस्या का अंत हो गया हो.

तभी एक बूढ़ा और अनुभवी चूहा खड़ा हुआ और बोला, “मूर्खों, नाचना-गाना बंद करो और ज़रा ये तो बताओ कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधेगा?”

ये सुनना था कि चूहों का नाचना-गाना बंद हो गया. बिल्ली के गले में घंटी बांधना अपनी जान से हाथ धोना था. कोई इसके लिए तैयार नहीं हुआ. सभा में शांति छा गई थी. तभी इस शांति को चीरते हुए बिल्ली के कदमों की आहट सबके कानों में पड़ी और फिर क्या था? सब सिर पर पैर रखकर अपने-अपने बिलों की ओर भाग खड़े हुए.

सीख –

योजना बनाने का कोई औचित्य नहीं, यदि उसे लागू न किया जा सके.

 

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