शिव स्तुति

शिव स्तुति मंत्र PDF | Shiv Stuti Mantra lyrics in Hindi PDF File

शिव स्तुति मंत्र PDF | Shiv Stuti Mantra lyrics in Hindi PDF File

Shiv Stuti Mantra: आज के समय में हर व्यक्ति किसी न किसी तरह की परेशानियों से घिरा हुआ .है ऐसे समय में सभी लोग सिर्फ भगवान को ही याद करते हैं. वहीं कई लोग इसमें पूजा-पाठ करते हैं तो, कोई ऐसा मंत्र का पाठ करता है, जिसकी मदद से उसकी सारी परेशानियां दूर हो जाती है और शांतिपूर्ण तरीके से अपना जीवन बिता सकता है.

शिव स्तुति

शिव स्तुति

इस तरह से आज हम आपको एक ऐसा ही शिव मंत्र स्तुति बताने जा रहे हैं, जिसकी मदद से आप शिव भगवान की स्तुति तो कर ही सकते हैं. साथ ही उनके असीम कृपा भी प्राप्त कर सकते हैं. इस स्थिति की मदद से भगवान शंकर को काफी जल्दी खुश किया जा सकता है.

जेसे भगवान की हम स्तुति बताने जा रहे हैं, वह भगवान शंकर के अवतार माने गए शंकराचार्य द्वारा रची गई थी. जिसे साक्षा शंकर द्वारा दिया गया सुख का मंत्र भी माना जाता है. इसका पाठ करने से मनुष्य के सभी कठिनाइयां दूर हो जाती है. कोई भी मनुष्य प्रतिदिन नहीं है, सिर्फ सोमवार सुबह शाम भगवान शिव की पूजा कर्ज का पाठ करता है तो उसकी  सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है.

जाने शिव पूजन की सरल विधि और मंगलमय मंत्र स्तुति

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शिव पूजन की सरल विधि:-

प्रतिदिन सुबह शिवलिंग पर जल, दूध या पंचामृत स्नान के बाद फूल और श्रीफल अर्पित करें। तत्पश्चात शाम के समय भगवान भोलेनाथ की पंचोपचार पूजा में बिल्वपत्र, धतूरा, आंकड़ा, अक्षत, सफेद एवं केसर चंदन तथा मिठाई का भोग लगाएं और मंत्र स्तुति का पाठ कर प्रसाद ग्रहण करें।

इस दिन करे उपासना

सोमवार का दिन देवों के देव महादेव को समर्पित होता है। इस दिन शिवजी संग माता पार्वती जी की पूजा उपासना की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि सोमवार के दिन शिव परिवार की पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। साथ ही जीवन में सुख और समृद्धि का आगमन होता है। देवों के देव महादेव की पूजा करने से अविवाहितों की शादी शीघ्र हो जाती है। अगर आप भी शिवजी को प्रसन्न करना चाहते हैं, तो पूजा के समय ये स्तुति जरूर करें। इससे सभी संकटों से मुक्ति मिलती है। आइए जानते हैं-

शिव स्तुति मंत्र

पशूनां पतिं पापनाशं परेशं गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम।

जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवारिं महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम।1।

 

महेशं सुरेशं सुरारातिनाशं विभुं विश्वनाथं विभूत्यङ्गभूषम्।

विरूपाक्षमिन्द्वर्कवह्नित्रिनेत्रं सदानन्दमीडे प्रभुं पञ्चवक्त्रम्।2।

 

गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं गवेन्द्राधिरूढं गुणातीतरूपम्।

भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं भवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम्।3।

 

शिवाकान्त शंभो शशाङ्कार्धमौले महेशान शूलिञ्जटाजूटधारिन्।

त्वमेको जगद्व्यापको विश्वरूप: प्रसीद प्रसीद प्रभो पूर्णरूप।4।

 

परात्मानमेकं जगद्बीजमाद्यं निरीहं निराकारमोंकारवेद्यम्।

यतो जायते पाल्यते येन विश्वं तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम्।5।

 

न भूमिर्नं चापो न वह्निर्न वायुर्न चाकाशमास्ते न तन्द्रा न निद्रा।

न गृष्मो न शीतं न देशो न वेषो न यस्यास्ति मूर्तिस्त्रिमूर्तिं तमीड।6।

 

अजं शाश्वतं कारणं कारणानां शिवं केवलं भासकं भासकानाम्।

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तुरीयं तम:पारमाद्यन्तहीनं प्रपद्ये परं पावनं द्वैतहीनम।7।

 

नमस्ते नमस्ते विभो विश्वमूर्ते नमस्ते नमस्ते चिदानन्दमूर्ते।

नमस्ते नमस्ते तपोयोगगम्य नमस्ते नमस्ते श्रुतिज्ञानगम्।8।

प्रभो शूलपाणे विभो विश्वनाथ महादेव शंभो महेश त्रिनेत्।

शिवाकान्त शान्त स्मरारे पुरारे त्वदन्यो वरेण्यो न मान्यो न गण्य:।9।

 

शंभो महेश करुणामय शूलपाणे गौरीपते पशुपते पशुपाशनाशिन्।

काशीपते करुणया जगदेतदेक-स्त्वंहंसि पासि विदधासि महेश्वरोऽसि।10।

 

त्वत्तो जगद्भवति देव भव स्मरारे त्वय्येव तिष्ठति जगन्मृड विश्वनाथ।

त्वय्येव गच्छति लयं जगदेतदीश लिङ्गात्मके हर चराचरविश्वरूपिन।11।

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