शिव तांडव स्त्रोत

शिव तांडव स्तोत्र सरल भाषा में | Shiv Tandav Stotram [PDF] Download

शिव तांडव स्तोत्र सरल भाषा में | Shiv Tandav Stotram [PDF] Download

Shiv Tandav Stotram: हिंदू धर्म में सभी देवी देवताओं में सबसे ऊंचा स्थान शिव शंकर को दिया गया है, यही वजह है कि देवा दी देव महादेव के नाम से जाने जाते हैं। यह कालों के काल भी कहलाते है, इनकी कृपा से सभी तरह के संकट दूर हो जाते हैं, भगवान शिव को मनुष्य के साथ साथ देवी देवता और असुर और सभी पूजते हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार रावण भी महादेव की पूजा-अर्चना करता था।

शिव तांडव स्त्रोत की रचना किसने की  

शिव तांडव स्त्रोत

रावण भगवान शिव को काफी मानता था, आपको बता दें कि, रावण द्वारा ही शिव तांडव स्त्रोत की रचना भी की गई है शिव तांडव स्त्रोत में कुल 17 श्लोक है, जिसमें भगवान शिव की स्तुति गाई गई है शिव पुराण के अनुसार एक बार रावण ने कैलाश को उठाने का प्रयत्न किया था। इसके बाद शिवजी ने अपने अंगूठे से पर्वत को दबाकर स्थिर कर दिया, जिससे रावण का हाथ पर्वत के नीचे दब गया तब उसे काफी पीड़ा हुई थी और भगवान शिव की स्तुति उसने गई थी। रावण द्वारा गाई गई है इस स्तुति शिव तांडव स्त्रोत के नाम से जानी जाती है।

साथ ही यह मान्यता भी है कि, शिव तांडव स्त्रोत का पाठ करने से भगवान शिव काफी अधिक जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं, वही भगवान शिव को या पाठ काफी प्रिय भी है।

शिव तांडव स्तोत्र के फायदे

मान्यता है कि नियमित रूप से शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करने से कभी भी धन-सम्पति की कमी नहीं होती है। इस पाठ को करने से व्यक्ति का चेहरा तेजमय होता है, आत्मबल मजबूत होता है। धार्मिक मान्यता है कि शिवतांडव स्तोत्र का पाठ करने से हर मनोकामना पूर्ण हो जाती है। महादेव नृत्य, चित्रकला, लेखन, योग, ध्यान, समाधी आदि सिद्धियों को प्रदान करने वाले हैं। ऐसे में शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करने से इन सभी विषयों में सफलता प्राप्त होती है।

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इसके अलावा जिन लोगों की कुण्डली में सर्प योग, कालसर्प योग या पितृ दोष लगा हुआ हो, उन्हें भी शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। साथ ही शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करने से शनि दोष को कुप्रभावों से भी छुटकारा मिलता है।

शिव तांडव स्तोत्र करने की विधि

धार्मिक मान्यता के अनुसार जब भी शिव तांडव स्त्रोत का पाठ किया जाता है तो, इसके लिए सबसे बेहतर समय प्रातः कालीन प्रदोष काल माना गया है। शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करने के लिए सबसे पहले स्नान करने और अच्छे साफ-सुथरे कपड़े पहले फिर भगवान भोलेनाथ को प्रणाम करें और सामने धूप दीप नैवेद्य चढ़ाकर पूजन अर्चन करें मान्यता है कि, रावण ने पीड़ा के कारण से सूरत को बहुत तेज सुर में गाया था, इसलिए आप भी काकर शिव तांडव स्त्रोत का पाठ कर सकते हैं। माना जाता है कि, इसका पाठ करना सर्वोत्तम होता है, लेकिन केवल पुरुषों को ही करना चाहिए। भगवान शिव का ध्यान करें और सच्चे मन से इस पाठ का आवन करें, ताकि आप की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो और आपके जीवन में आने वाले सभी कष्ट दूर हो जाए।

शिव तांडव स्तोत्र सरल भाषा में लिरिक्स

शिव तांडव स्तोत्र ॥

 

जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले

गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्‌ ।

डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं

चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥1॥

 

अर्थ – जिन्होंने जटारुपी अटवी ( वन ) से निकलती हुई गंगा जी के गिरते हुए प्रवाहों से पवित्र किये गए गले में सर्पों की लटकती हुई विशाल माला को धारण कर डमरू के डम डम शब्दों से मण्डित प्रचंड तांडव नृत्य किया, वे शिवजी हमारे कल्याण का विस्तार करें।

 

जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-

विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्द्धनी ।

धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके

किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥2॥

 

अर्थ – जिनका मस्तक जटारुपी कड़ाह में वेग से घूमती हुई गंगा की चंचल तरंगों से सुशोभित हो रहा है, ललाट की अग्नि धक् धक् जल रही है, सिर पर चन्द्रमा विराजमान हैं, उन भगवान शिव में मेरा निरंतर अनुराग हो।

 

धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर-

स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे ।

कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि

क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥3॥

 

अर्थ – गिरिराज किशोरी पार्वती के शिरोभूषण से समस्त दिशाओं को प्रकाशित होते देख जिनका मन आनंदित हो रहा है।

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जिनकी निरंतर कृपादृष्टि से कठिन से कठिन आपत्ति का भी निवारण हो जाता है, ऐसे किसी दिगंबर तत्व में मेरा मन आनंद प्राप्त करे।

 

जटाभुजंगपिंगलस्फुरत्फणामणिप्रभा-

कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे ।

मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे

मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥4॥

 

अर्थ – जिनकी जटाओं में रहने वाले सर्पों के फणों की मणियों का फैलता हुआ प्रभापुंज दिशा रुपी स्त्रियों के मुख पर कुंकुम का लेप कर रहा है।

 

मतवाले हाथी के हिलते हुए चमड़े का वस्त्र धारण करने से स्निग्ध वर्ण हुए उन भूतनाथ में मेरा चित्त अद्भुत आनंद करे।

 

सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर-

प्रसूनधूलिधोरणीविधूसराङ्घ्रिपीठभूः ।

भुजंगराजमालया निबद्धजाटजूटकः

श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥5॥

 

अर्थ – जिनकी चरण पादुकाएं इन्द्र आदि देवताओं के प्रणाम करने से उनके मस्तक पर विराजमान फूलों के कुसुम से धूसरित हो रही हैं। नागराज के हार से बंधी हुई जटा वाले वे भगवान चंद्रशेखर मुझे चिरस्थाई संपत्ति देनेवाले हों।

 

ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा-

निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम्‌ ।

सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं

महाकपालि सम्पदे शिरो जटालमस्तु नः ॥6॥

 

अर्थ – जिन्होंने ललाट वेदी पर प्रज्वलित हुई अग्नि के तेज से कामदेव को नष्ट कर डाला था, जिनको इन्द्र नमस्कार किया करते हैं।

 

सुधाकर ( चन्द्रमा ) की कला से सुशोभित मुकुट वाला वह उन्नत विशाल ललाट वाला जटिल मस्तक हमें संपत्ति प्रदान करने वाला हो।

 

करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-

द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके ।

धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-

प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥7॥

 

अर्थ – जिन्होंने अपने विकराल ललाट पर धक् धक् जलती हुई प्रचंड अग्नि में कामदेव को भस्म कर दिया था। गिरिराज किशोरी के स्तनों पर पत्रभंग रचना करने के एकमात्र कारीगर उन भगवान त्रिलोचन में मेरा मन लगा रहे।

 

नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुर-

त्कुहूनिशीथिनीतमःप्रबन्धबद्धकन्धरः ।

निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः

कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः ॥8॥

 

अर्थ – जिनके कंठ में नवीन मेघमाला से घिरी हुई अमावस्या की आधी रात के समय फैलते हुए अंधकार के समान कालिमा अंकित है।

 

जो गजचर्म लपेटे हुए हैं, वे संसार भार को धारण करने वाले चन्द्रमा के समान मनोहर कांतिवाले भगवान गंगाधर मेरी संपत्ति का विस्तार करें।

 

प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा-

वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम्‌ ।

स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं

गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥9॥

 

अर्थ – जिनका कंठ खिले हुए नील कमल समूह की श्याम प्रभा का अनुकरण करने वाली है तथा जो कामदेव, त्रिपुर, भव ( संसार ), दक्षयज्ञ, हाथी, अन्धकासुर और यमराज का भी संहार करने वाले हैं, उन्हें मैं भजता हूँ।

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अखर्वसर्वमंगलाकलाकदम्बमञ्जरी-

रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम्‌ ।

स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं

गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥10॥

 

अर्थ – जो अभिमान रहित पार्वती जी के कलारूप कदम्ब मंजरी के मकरंद स्रोत की बढ़ती हुई माधुरी के पान करने वाले भँवरे हैं तथा कामदेव, त्रिपुर, भव, दक्षयज्ञ, हाथी, अन्धकासुर और यमराज का भी अंत करनेवाले हैं, उन्हें मैं भजता हूँ।

 

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजंगमश्वस-

द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् ।

धिमिद्धिमिद्धिमिद्ध्वनन्मृदंगतुंगमंगल-

ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः ॥11॥

 

अर्थ – जिनके मस्तक पर बड़े वेग के साथ घूमते हुए साँपों के फुफकारने से ललाट की भयंकर अग्नि क्रमशः धधकती हुई फैल रही है। धीमे धीमे बजते हुए मृदंग के गंभीर मंगल स्वर के साथ जिनका प्रचंड तांडव हो रहा है , उन भगवान शंकर की जय हो।

 

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंगमौक्तिकस्रजो-

र्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।

तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः

समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम् ॥12॥

 

अर्थ – पत्थर और सुन्दर बिछौनों में, सांप और मोतियों की माला में, बहुमूल्य रत्न और मिटटी के ढेले में, मित्र या शत्रु पक्ष में, तिनका या कमल के समान आँखों वाली युवती में, प्रजा और पृथ्वी के राजाओं में समान भाव रखता हुआ मैं कब सदाशिव को भजूँगा ?

 

कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्‌

विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन्‌ ।

विलोललोललोचनो ललामभाललग्नकः

शिवेति मन्त्रमुच्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ॥13॥

 

अर्थ – सुन्दर ललाट वाले भगवान चन्द्रशेखर में मन को एकाग्र करके अपने कुविचारों को त्यागकर गंगा जी के तटवर्ती वन के भीतर रहता हुआ सिर पर हाथ जोड़ डबडबाई हुई विह्वल आँखों से शिव मंत्र का उच्चारण करता हुआ मैं कब सुखी होऊंगा ?

 

इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं

पठन् स्मरन् ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति सन्ततम्‌ ।

हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं

विमोहनं हि देहिनां सुशंकरस्य चिन्तनम् ॥14 ॥

 

अर्थ – जो मनुष्य इस उत्तमोत्तम स्तोत्र का नित्य पाठ, स्मरण और वर्णन करता है, वह सदा शुद्ध रहता है और शीघ्र ही भगवान शंकर की भक्ति प्राप्त कर लेता है। वह विरुद्ध गति को प्राप्त नहीं करता क्योंकि शिव जी का ध्यान चिंतन मोह का नाश करने वाला है।

 

पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं

यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे ।

तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरंगयुक्तां

लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥15 ॥

 

अर्थ – सायंकाल में पूजा समाप्त होने पर जो रावण के गाये हुए इस शिव तांडव स्तोत्र ( Shiv Tandav Stotram ) का पाठ करता है, भगवान शंकर उस मनुष्य को रथ, हाथी, घोड़ों से युक्त सदा स्थिर रहने वाली संपत्ति प्रदान करते हैं।

 

|| शिव तांडव स्तोत्र समाप्त ||

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