स्वामी विवेकानंद का बचपन

स्वामी विवेकानंद जीवनी परिचय फ्री PDF | Swami Vivekananda Biography in Hindi

स्वामी विवेकानंद जीवनी परिचय फ्री PDF | Swami Vivekananda Biography in Hindi

Swami Vivekananda Biography: स्वामी विवेकानंद के बारे में हम सभी जानते हैं, आज हम आपको उनके जीवन से जुड़ी हुई सभी आवश्यक चीजें बताने वाले हैं। आपको बता दें कि, स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी अट्ठारह सौ पैसठ में हुआ था और उनकी मृत्यु 4 जुलाई उन्नीस सौ दो में हुई है।

स्वामी विवेकानंद का बचपन

स्वामी विवेकानंद का बचपन

उनका बचपन का नाम नरेंद्र नाथ था, वही उनके पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाईकोर्ट के वकील के रूप में जाने जाते थे। उनके पिता पाश्चात्य सभ्यता में विश्वास रखने वाले थे। वही अपने पुत्र नरेंद्र को भी वह अंग्रेजी बढ़ाकर सभ्यता के ढर्रे पर चलाना चाहते थे। इनकी माता श्रीमती भुवनेश्वरी देवी जी धार्मिक विचारों को मारने वाली रानी थी, उनका अधिकांश समय भगवान शिव की पूजा अर्चना में व्यतीत होता था।

बचपन में ही विश्वनाथ तथा उनके पिता की मृत्यु हो गई थी, उसके बाद से ही इन पर घर का बाहर बोझ बढ़ गया था। घर की दशा बहुत खराब थी और उनके घर की स्थिति दरिद्र थी स्वयं भूखे रहकर भी नरेंद्र अतिथि को भोजन कराते थे। स्वयं बाहर वर्षा में रात भर में रहते थे और अतिथि को अपने बिस्तर पर सुला देते थे।

स्वामी विवेकानंद अपना जीवन अपने गुरुदेव श्री रामकृष्ण को समर्पित कर चुके थे और गुरु के शरीर त्याग के दिनों में अपने घर और कुटुंब की नाजुक हालत को चिंता किए बिना, वह स्वयं के भोजन की चिंता किए बिना गुरु सेवा में संलग्न रहते थे।

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गुरु के प्रति अनन्य भक्ति

गुरु के प्रति ऐसी अनन्य भक्ति और निष्ठा के प्रताप से ही वे अपने गुरु के शरीर और उनके दिव्यतम आदर्शों की उत्तम सेवा कर सके। गुरुदेव को वे समझ सके, स्वयं के अस्तित्व को गुरुदेव के स्वरूप में विलीन कर सके। समग्र विश्व में भारत के अमूल्य आध्यात्मिक खजाने की महक फैला सके। उनके इस महान व्यक्तित्व की नींव में थी ऐसी गुरुभक्ति, गुरुसेवा और गुरु के प्रति अनन्य निष्ठा

25 वर्ष की अवस्था में नरेंद्र दत्त ने गेरुआ वस्त्र पहन लिए। तत्पश्चात उन्होंने पैदल ही पूरे भारतवर्ष की यात्रा की। सन्‌ 1893 में शिकागो (अमेरिका) में विश्व धर्म परिषद् हो रही थी। स्वामी विवेकानंदजी उसमें भारत के प्रतिनिधि के रूप से पहुंचे। योरप-अमेरिका के लोग उस समय पराधीन भारतवासियों को बहुत हीन दृष्टि से देखते थे। वहां लोगों ने बहुत प्रयत्न किया कि स्वामी विवेकानंद को सर्वधर्म परिषद् में बोलने का समय ही न मिले। एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयास से उन्हें थोड़ा समय मिला किंतु उनके विचार सुनकर सभी विद्वान चकित हो गए।

स्वामी विवेकानंद जी के जीवन से हमें क्या शिक्षा मिलती है?

स्वामी विवेकानंद की सबसे बड़ी दी गयी शिक्षा उठो, जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य ना प्राप्त हो जाए। स्वामी विवेकानंद के जीवन से हमें क्या शिक्षा मिलती है? स्वामी विवेकानंद के जीवन से हमें यह शिक्षा मिलती है कि अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के कड़ी मेहनत करे नथा मानवता और धर्म के लिए जीवन जिए।

शिकागो धर्म महा सम्मलेन भाषण

अमेरिकी बहनों और भाइयों,
आपने जिस सौहार्द और स्नेह के साथ हम लोगों का स्वागत किया हैं, उसके प्रति आभार प्रकट करने के निमित्त खड़े होते समय मेरा हृदय अवर्णनीय हर्ष से पूर्ण हो रहा हैं। संसार में संन्यासियों की सब से प्राचीन परम्परा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूँ; धर्मों की माता की ओर से धन्यवाद देता हूँ; और सभी सम्प्रदायों एवं मतों के कोटि कोटि हिन्दुओं की ओर से भी धन्यवाद देता हूँ।
मैं इस मंच पर से बोलनेवाले उन कतिपय वक्ताओं के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ, जिन्होंने प्राची के प्रतिनिधियों का उल्लेख करते समय आपको यह बतलाया हैं कि सुदूर देशों के ये लोग सहिष्णुता का भाव विविध देशों में प्रचारित करने के गौरव का दावा कर सकते हैं। मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूँ, जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृति, दोनों की ही शिक्षा दी हैं। हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते, वरन् समस्त धर्मों को सच्चा मान कर स्वीकार करते हैं। मुझे ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान हैं, जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया हैं। मुझे आपको यह बतलाते हुए गर्व होता हैं कि हमने अपने वक्ष में यहूदियों के विशुद्धतम अवशिष्ट को स्थान दिया था, जिन्होंने दक्षिण भारत आकर उसी वर्ष शरण ली थी, जिस वर्ष उनका पवित्र मन्दिर रोमन जाति के अत्याचार से धूल में मिला दिया गया था । ऐसे धर्म का अनुयायी होने में मैं गर्व का अनुभव करता हूँ, जिसने महान् जरथुष्ट्र जाति के अवशिष्ट अंश को शरण दी और जिसका पालन वह अब तक कर रहा हैं। भाईयो, मैं आप लोगों को एक स्तोत्र की कुछ पंक्तियाँ सुनाता हूँ, जिसकी आवृति मैं बचपन से कर रहा हूँ और जिसकी आवृति प्रतिदिन लाखों मनुष्य किया करते हैं:

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